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Kerala

आखिरकार केरल में भी मुस्लिम संस्थान के आदेश से बुर्का बैन पर बहस छिड़ी

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केरल के एक शिक्षण संस्थान का छात्राओं के नक़ाब पहनने से रोक के फ़ैसले ने बुर्का पर रोक लगाने की बहस को एक नया आयाम दिया है.

केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक में क़रीब 100 स्कूल, डिग्री और पेशेवर कॉलेज चलाने वाली संस्था मुस्लिम एजुकेशन सोसाइटी (एमईएस) ने दिसंबर 2018 में केरल हाई कोर्ट के उस फ़ैसले को बरकरार रखा है जिसमें व्यक्तिगत अधिकारों से शैक्षणिक संस्थान के अधिकारों को क़ानूनी तौर पर ऊपर माना गया था.

एमईएस के अध्यक्ष डॉक्टर फ़ज़ल गफ़ूर ने बीबीसी हिंदी को बताया, “इसका श्रीलंका के मुद्दे से कोई लेना-देना नहीं है. हमने अपने सभी संस्थानों को 17 अप्रैल को ही सर्कुलर जारी कर दिया था. हम नक़ाब पहनने (चेहरे को ढंकने) के ख़िलाफ़ हैं.”

लेकिन केरल के मुस्लिम संगठन समस्त केरल जमीयत-उल-उलेमा ने एमईएस के इस रुख़ का विरोध किया है. समस्त केरल जमीयत-उल-उलेमा के वकील और प्रवक्ता तैय्यब हुदावी कहते हैं, “छात्राओं को बुर्का पहनने से नहीं रोका जा सकता है. यह उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मुद्दा है.”

एमईएस के इस फ़ैसले ने श्रीलंका में ईस्टर संडे के दिन सीरियल धमाकों के बाद बुर्का पहनने पर प्रतिबंध लगाने के मामले में बहस को एक नया आयाम दिया है, उन हमलों में लगभग 250 लोगों की जानें गई थीं.

इस फ़ैसले पर मुसलमानों के सहयोग को देखते हुए शिव सेना प्रवक्ता संजय राउत ने भारत में भी बुर्का और नक़ाब पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है.

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केरल हाई कोर्ट ने क्या कहा?

केरल हाई कोर्ट में क्राइस्ट नगर सीनियर सेकेंडरी स्कूल की दो नाबालिग छात्राओं फ़ातिमा तसनीम और हफ़ज़ा परवीन की तरफ से एक याचिका दायर की गई थी. उनकी शिकायत थी कि उन्हें स्कूल में हेडस्कार्फ़ (हिजाब) और फुल स्लीव शर्ट नहीं पहनने को कहा गया था. याचिका में ये भी कहा गया कि स्कूल ने उनकी गुज़ारिश को अस्वीकार कर दिया क्योंकि यह ‘ड्रेस कोड’ के ख़िलाफ़ था.

इस पर जस्टिस ए मुहम्मद मुश्ताक़ ने अपने फ़ैसले में कहा कि छात्रों का अपनी इच्छानुसार कपड़े पहनने का निर्णय उनका उतना ही मौलिक अधिकार है, जितना कि स्कूल का यह अधिकार कि वो यह सुनिश्चित करे कि सभी छात्र एक तरह के ड्रेस ही पहनें, जो स्कूल ने चुनी हो.

जस्टिस मुश्ताक़ ने छात्राओं और स्कूल दोनों के मौलिक अधिकारों के बीच टकराव के दृष्टिकोण से इस मुद्दे की जांच करने का निर्णय लिया. ऐसा इसलिए क्योंकि: ”संविधान में ऐसे समाज की परिकल्पना की गई है कि जहां बड़े स्तर पर समाज के हितों को देखते हुए अधिकारों को संतुलित किया जाता है.”

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इस मामले में, कोर्ट ने महसूस किया कि “सबसे बड़ा हित कई सरोकारों का प्रतिनिधित्व करते हैं और कम महत्वपूर्ण हित केवल व्यक्तिगत हित का प्रतीक हैं. यदि बड़े स्तर के हितों की अनदेखी की जाएगी तो कम महत्व के मुद्दे हावी हो जाते हैं जिससे अव्यवस्था उत्पन्न होती है.”

फ़ैसले में कहा गया, “इस मामले में सबसे बड़ा हित संस्था के प्रबंधन का है. यदि प्रबंधन संस्था को उसके संचालन के लिए खुली छूट नहीं दी गई तो यह उसके मौलिक अधिकारों को नष्ट करना होगा. संवैधानिक अधिकारों का उद्देश्य दूसरे के अधिकारों का हनन करके किसी एक के अधिकार की रक्षा करना नहीं है. वास्तव में, संविधान सर्वसम्मति और प्रमुखता से बड़े स्तर पर होने वाले लोगों के हितों का समावेश करता है. हालांकि, जब बात प्राथमिकता देने की हो तो, व्यक्तिगत हित की तुलना में बड़े स्तर पर हितों के लाभ को तरजीह देनी चाहिए.”

जस्टिस मुश्ताक़ ने कहा, “अधिकारों का टकराव का समाधान व्यक्तिगत अधिकारों की अवहेलना करके नहीं बल्कि संस्था और छात्राओं के बीच इस तरह के संबंध को बनाए रखने के बड़े अधिकार के बरकरार रखते हुए हल किया जा सकता है.”

कोर्ट ने कहा कि ट्रांसफर सर्टिफ़िकेट (टीसी) बिना किसी टिप्पणी के जारी की जाए.

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बहस का मुद्दा

तो फिर एमईएस ने इस साल प्रतिबंध लगाने का फ़ैसला क्यों किया?

डॉक्टर गफ़ूर ने कहा कि, “बीते वर्ष, हमारे पास दो छात्राएं नकाब में आई थीं, जिस पर हमने आपत्ति की थी. एडमिशन सुपरवाइजरी कमेटी ने कहा कि हम आपत्ति नहीं कर सकते क्योंकि हमारे प्रॉस्पेक्टस में इस बारे में कुछ लिखा नहीं था. अब जून में एडमिशन शुरू होने जा रहा है तो हमने इस बारे में अपने सभी संस्थानों को एक सर्कुलर जारी करना ज़रूरी समझा.”

लेकिन क्या एमईएस अपने छात्राओं के हिजाब पहनने की अनुमति देगा?

गफ़ूर कहते हैं, “हिजाब एक कपड़े के अलावा और कुछ नहीं है. यह फैशन बन गया है.”

डॉक्टर गफ़ूर का मानना है कि बुर्क़ा बाहरी संस्कृति है. यह चार-पांच साल पहले मौजूद नहीं था. खाड़ी से लौटे लोग इसे वहां से ला रहे हैं.”

वो मानते हैं कि मौलवियों को इस पर चिंता नहीं करनी चाहिए. “महिलाओं को अपना चेहरा क्यों ढंकना चाहिए. उनकी अपनी पहचान है. यह एक आदिम रीति है.”

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डॉक्टर गफ़ूर के मुताबिक, मौलवियों का अपने समुदाय पर वैसा नियंत्रण नहीं है जैसा ईसाई धर्म के पादरियों का अपने समुदाय पर है. ऐसा इसलिए है क्योंकि पादरी शैक्षणिक संस्थान चलाते हैं. मौलवियों के पास बहुत से संस्थान नहीं हैं. हमारा मौलवियों से कोई लेना-देना नहीं है.”

लेकिन, समस्त केरल जमायत-उल-उलेमा के प्रवक्ता हुदावी यह कहते हुए इसका विरोध करते हैं कि, ”महिलाओं को अजनबियों से अपनी सुरक्षा के लिए चेहरा ढंकना पड़ता है. एमइएस को यह कहने का अधिकार नहीं है कि महिला को अपना चेहरा ढंकने का कोई अधिकार नहीं है.”

हुदावी कहते हैं. “वो हाई कोर्ट के फ़ैसले को अपना आधार बना रहे हैं. यह मामला उच्च पीठ के सामने लंबित है.”

 

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क्या नक़ाब पहनना इस्लाम में ज़रूरी है?

हैदराबाद में एनएएलएसएआर यूनिवर्सिटी ऑफ़ लॉ में उप-कुलपति प्रोफ़ेसर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा ने बीबीसी हिंदी से कहा, “सैद्धांतिक रूप से उलेमाओं से कोई एकमत नहीं है. इस पर एक विचार नहीं है.”

वो कहते हैं, “यह मेरा निजी विचार है कि बुर्का अपनी पसंद का विषय है. यदि कोई इसे पहनना चाहता है तो उन्हें इसकी अनुमति दी जानी चाहिए. लेकिन आप अपने फ़ैसले किसी पर थोप नहीं सकते. जब किसी चीज़ पर आपत्ति जताई जाती है तो आप पाएंगे कि लोग ऐसा करने लगते हैं. और, मुस्लिम समुदाय रूढ़िवादी उलेमाओं से प्रभावित है.”

उन्होंने कहा, “तो, शिक्षित महिलाओं के लिए, यह उनकी पसंद का विषय है. दूसरी तरफ, जो उतनी शिक्षित नहीं हैं वो इसे छोड़ रही हैं. लेकिन, आप संवैधानिक रूप से इसे चुनौती नहीं दे सकते क्योंकि सवाल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का है.”

प्रोफ़ेसर मुस्तफ़ा कहते हैं कि श्रीलंका में बुर्के पर प्रतिबंध लगाने का कारण वहां हुआ दर्दनाक चरमपंथी हमला है.

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