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LUCKNOW

डिजटल इन्डिया मे चालकों का डिजटल शोषण करती ओला ,ऊबर आदि निजी कंम्पनियां

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बिना मानक मनमानी करती कंम्पनियों पर नही है शासन प्रशासन का कोई दबाव।

लखनऊ:- एक ओर केन्द्र और राज्य भा०ज०पा०सरकार भारत से भष्टाचार मुक्त करने का वादा कर रही है ।और गरीबों के विकास को लक्ष्य मान कर आगामी 2019लोकसभा चुनाव की तैयारी कर रहु है ।तो दूसरी ओर इसी सरकार के शासन मे चालक(ड्राइवर)का शोषण एक आम बात हो गई है। सरकार की अनुमति से चलने वाली ट्रवल कंम्पनियों मे राजधानी मे सबसे पहले ओला,ऊबर का नाम आता है। जहां कम पढे लिखे व कम्पनी का लालच दे फाइनेस करवाने वाले वाहन मालिकों का डिजटल शोषण आम बात है जिस के चलते चालक सारथी वेल्फेयर एसोशिएसन लखनऊ द्वारा चालकों की समस्याओं को लेकर दिल्ली सांसद भवन का घेराव भी किया गया था ।परंतु शासन ,प्रशासन से कोई कार्यवाई होने के कारण ओला,ऊबर आदि निजी कंम्पनियों द्वारा चालकों का शोषण बढता जा रहा है। इन कम्पनियों मे चालकों के लिए कोई मानक नही हैं और अगर हैं तो कंम्पनी कर्मचारी इसकी जानकारी चालकों को देते नही है। मन माने रेट पर बुकिग कर चालकों को कम रेट दे बचत कि आधा हिस्सा कंम्पनिया कमीशन के नाम पर डकार रही है।जब दिल करे जिसे दिल करे कर्मचारी अपनी मर्जी से उस की डिवाइस बन्द कर उसे बेइज्त कर या वापस लेते है या बाहर कर देते है। बिना मानक के चल रही कंम्पनियों मे चालक ,गाड़ी की सुरक्षा कु कंम्पनी की कोई जिम्मेदारी नही । अगर चालक पसिन्जर की इच्छा से 10कदम पहले उतारता है तो चालक का पैसा काट दिया जाता है। परंतु अगर चालक 5कि०मी०दूर से सवारी को लेने आता है तो उस 5कि०मी०का कोई पैसा चालक को नही मिलता ।और अगर वो 5कि०मी०दूरी की सवारी लेने नही जाता तो भी उस का पैसा काट दिया जाता है ।ऐसे ही क ई अपने निजी कानून बना कर ये निजी कंम्पनिया खुले आम चालको का शोषण न मालूम किस के शह पर क ई वर्षो से करती चली आ रही है। परंतु गरीब चालको की दबी कुचली आवाज़ को सुन्ने वाला कोई नही निजी कंम्पनियों द्वारा संम्बंधित विभाग के अधिकारियों को निजी फायदा पहुंचा अपना उल्लू सीधा कर एक तो सरकारी परिवाहन विभाग को करोड़ो का चूना लगा राजस्व को लूट रही है साथ ही साथ गरीब चालकों के खून पसीने की कमाई पर भी डाका डाल रही है ।ऐसी कंम्पनियों के मामलों मे सरकार की उदासीनता सरकार के प्रति भष्टाचार की शंका को जाहिर करता है। जल्द ही दिल्ली मे हुई ओला चालक की हत्या के बाद भड़के चालकों को समझाने व उन की भावनाओं को समझने की बजाए प्रशासन द्वारा उन्हे खदेड़ना अंग्रेजी हुकूमत की हमे याद दिलाता है जहां लोगों की भावनाओं को समझे बिना फरमान सुनाए जाते थे वही आज फिर दोहराया जा रहा है परंतु अफ्सोस ये है कि आज चालको द्वारा चुनी गई उनकी अपनी सरकार द्वारा उन्हे खदेड़ा गया । जब सत्ता मे बैठने वाले सत्ता के नशे मे चूर होते है तो गरीबों और कमजोरों को ऐसे ही दबाया जाता है । एक चालक की हत्या के बाद कंम्पनी द्वारा चालक परिवार की मदद करवाने के बजाए कम्पनी से मिलकर चालकों की आवाज़ को दबाने का प्रयास किया जा रहा है जो सोचनीय है।

जुबेर अहमद

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