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दुनियां में सिर्फ जम्मू-कश्मीर में होता है ऐसा, छह माह बाद बदलती है राधजानी, खर्च होते हैं 400 करोड़

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जम्मू, अवधेश चौहान। सर्दियों में छह माह सचिवालय जम्मू और गर्मियों में छह माह श्रीनगर। डोगरा शासकों की इस प्रथा को 146 साल बीत चुके हैं। यह परंपरा आज सूचना तंत्र के युग में भी जारी है। एक वर्ष में दो बार लाव लश्कर (कर्मचारी रिकार्ड) को इधर से उधर करने में करीब चार सौ करोड़ खर्च हो जाता है। सचिवालय में दस हजार से अधिक कर्मचारी व अधिकारी तैनात हैं। छह माह में उन्हें टीए के तौर पर पंद्रह-पंद्रह हजार के अलावा अन्य तमाम सुविधाएं मिलती हैं। इस बार श्रीनगर में छह माह के लिए 26 अक्टूबर को सचिवालय बंद हो रहे हैं। शीतकालीन जम्मू में दरबार पांच नवंबर को खुल जाएगा। सभी तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। रिकार्ड लेकर संदूक ट्रकों में पहुंचना शुरू हो जाएंगे।

अधिकारियों की मानें तो कर्मचारियों का ट्रेवलिंग एवं डीएनएस एलाउंस उनके ठहराने व वाहनों के पेट्रोल का खर्च, घरों की पुताई व रंग रोगन में चालीस करोड़ रूपए खर्च होते हैं। अगर 146 सालों से खर्च हो रही इस राशि का हिसाब किया जाए तो इतनी राशि से जम्मू-कश्मीर में विकास की कहानी कुछ और होती।

राजनीतिक एवं सामाजिक संगठन होने लगे लामबंद

दरबार मूव को लेकर जम्मू के राजनीतिक एवं सामाजिक संगठनों में इसे स्थायी रूप से एक जगह रखने की मांग उठने लगी है। डोगरा सदर सभा और पैंथर्स पार्टी यह मांग कर रही है कि निदेशालयों और कुछ कार्यालयों जिन्हें प्रथा के तहत स्थानांतरित कर दिया जाता है, को जम्मू और श्रीनगर में ही काम करने दिया जाए ताकि करोड़ों रुपए को विकास कार्यों में लगाया जा सके। वर्ष 2009 में पंजाब के एक व्यक्ति ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर दरबार मूव की प्रथा को बंद करने का आग्रह किया था। यह पत्र पीएमओ ने राज्य सरकार को भेजा क्योंकि यह मुद्दा संवेदनशील है, इसीलिए राज्य सरकार की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। वर्ष 1984 में सचिवालय और अन्य मूव कार्यालयों को जम्मू व श्रीनगर में स्थायी रूप से रहने दिए जाने को लेकर दो माह तक लोगों ने आंदोलन भी किया।

परंपरा बदलने की जरूरत

जम्मू विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग के प्रोफेसर दिपांकर सेन गुप्त का कहना है कि सत्ता का विकेंद्रीयकरण न होने से ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है। जम्मू-कश्मीर में भी यही हाल है। यहां पर ब्लाक स्तर पर सत्ता के अधिकार नहीं दिए हैं। सचिवालय स्थानांतरण से दो राजधानियों की परंपरा बदलेगी। तभी सत्ता का विकेंद्रीयकरण की संभावनाएं प्रबल होंगी।

कई अन्य कार्यालय भी करते हैं मूव

दरबार मूव के दौरान सचिवालय के अलावा अन्य मूव कार्यालयों जिनमें राजभवन, विधानसभा, पुलिस मुख्यालय, महिला आयोग, जवाबदेही आयोग और मानवाधिकार कार्यालयों का रिकार्ड दो राजधानियों में स्थानांतिरत करने से सौ ट्रकों का काफिला हफ्ते भर इधर से उधर करता है। इस हजार दरबार मूव कर्मचारियों को टीम के तौर पर साल में दो बार बीस-बीस हजार रुपए दिए जाते हैं। राज्य के पूर्व उपमुख्यमंत्री एवं भाजपा के वरिष्ठ नेता कविन्द्र गुप्ता का मानना है कि दरबार मूव से करोड़ों रूपए खर्च होते हैं। मौजूदा सूचना प्रसारण युग में फाइलों को कहीं भी भेजना आसान हो गया है। जहां तक हवाई सेवा का सवाल है, उससे कनेक्टीविटी काफी आसान हो गई है। इसमें कुछ ही घंटों में देश के किसी भी कोने में पहुंचा जा सकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि सचिवालय और निदेशालयों के अलावा कारपोरेशन के आफिस को जम्मू व श्रीनगर में काम करने दिया जाए तो इससे खर्च कम हो सकता है।

थम जाते हैं कई सरकारी काम

दरबार श्रीनगर जाने से जम्मू के लोगों के कई सरकारी काम लगभग रूक जाते हैं। कश्मीर में आतंकवाद के कारण सचिवालय में काम आए दिन बंद रहता है। बंद, हड़ताल व कफ्र्यू की वजह से लोग श्रीनगर नहीं जाते। इसीलिए उन्हें काम के लिए छह महीने इंतजार करना पड़ता है।

पांच प्रतिशत रिकार्ड पहुंचेगा पैनड्राइव में

राज्यपाल प्रशासन में इस बार दरबार मूव (नागरिक सचिवालय स्थानांतरित) में नई व्यवस्था लागू की है। हर साल भारी भरकम खर्च कर सामान व रिकॉर्ड को ट्रकों में भर-भरकर श्रीनगर से जम्मू लाने के बजाए इस बार पांच प्रतिशत डिजिटल रिकॉर्ड को पेन ड्राइव व एक्सटर्नल हार्ड डिस्क में लाया जाएगा हालांकि अन्य रिकॉर्ड पहले की तरह ही ट्रकों में लाया जा रहा है। अब सचिवालय कार्यालयों के आइटी ढांचे को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के बजाए जम्मू में अलग से आईटी ढांचा तैयार करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके तहत लैपटॉप, डेस्कटॉप, प्रिटर, यूपीएस जम्मू नहीं लाए जाएंगे, बल्कि इन्हें अलग से जम्मू के लिए खरीदा जाएगा। एक बार पूरी तरह स्थापित होने के बाद सामान हर बार खरीदने की जरूरत नहीं होगी और हर छह माह बाद दरबार मूव होने पर आने वाला खर्च भी कम होगा।

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