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पंजाब

लाखों प्रवासियों के लिए  वोट नहीं  पेट की भूख अहम है 

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अबोहर देश में हो रहे लोकसभा चुनावों के दौरान पोलिंग दर बढ़ाने हेतु चुनाव आयोग द्वारा किए जा रहे अनेक प्रयासों के उलट अभी भी लाखों गरीब लोग अपनी रोजी-रोटी का जुगाड़ करने के चक्कर में न सिर्फ चुनावी सरगर्मियों से कोसों दूर हैं, बल्कि दूसरे राज्यों में आए यह लोग अपनी वोट का इस्तेमाल करने से भी वंचित रह रहे हैं। विशेषकर पंजाब में गेहूं की कटाई और मंडीकरण के लिए आए तीन राज्यों के करीब 3 लाख मजदूर इस बार अपने राज्यों में जाकर अपनी वोट का इस्तेमाल नहीं कर सके। इन मजदूरों के लिए उनके परिवार और पेट की अहमियत वोट की अहमियत से कहीं अधिक है।

3 राज्यों से पंजाब में आए हैं प्रवासी मजदूर
एकत्रित विवरण के अनुसार पंजाब में करीब 152 मुख्य दाना मंडियों में 1800 के करीब खरीद केंद्र हैं, जिनमें गेहूं की खरीद का काम चल रहा है। इस साल राज्य में कुल 35 लाख हैक्टेयर गेहूं के रकबे की कटाई के बाद 90 फीसदी से अधिक मंडीकरण का काम मुकम्मल हो चुका है। गेहूं की कटाई और मंडीकरण हेतु पंजाब में बिहार, पश्चिमी बंगाल और उत्तर प्रदेश से करीब 3 लाख मजदूर प्रत्येक वर्ष आते हैं, जोकि अप्रैल के आखिर में या मई के दूसरे सप्ताह तक फ्री हो जाते हैं। यह लोग इस सीजन में करीब 20 से 30 हजार रुपए प्रति मजदूर के हिसाब से कमा कर घरों को लौटते हैं । यह राशि इन मजदूरों के परिवारों की अहम जरूरतों को पूरी करती है। इसी कारण इस बार भले ही इन तीन राज्यों में विभिन्न सीटों पर सभी चरणों में पोलिंग होती आ रही है, मगर इन मजदूरों ने अपना कामकाज छोड़कर अपने राज्यों में वोट डालने हेतु जाने की बजाय यहां रह कर काम करने को तरजीह दी है।

क्या कहना है मजदूरों का

इस संबंध में घनैया, बिहारी, शंकर और अन्य मजदूरों के साथ बातचीत की तो उन्होंने कहा कि वह वोट जरूर डालना चाहते हैं मगर वोट से भी पेट और परिवार ज्यादा अहमियत रखता है। उन्होंने कहा कि इस सीजन में कमाए पैसों से ही उन्होंने गुजारा करना होता है। इसलिए वह चाहकर भी वोट नहीं डाल सकते। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग को ऐसे प्रवासी मजदूरों के लिए वोट डालने हेतु उचित प्रबंध करने चाहिए।

इस बार देरी से हुआ कटाई और मंडीकरण का काम

आमतौर पर देखने में आता है कि अधिकांश मजदूर मई के पहले सप्ताह फ्री होकर अपने घरों को लौट जाते हैं, मगर इस बार पहले तो गेहूं की कटाई काफी पिछड़ कर हुई और बाद में मंडियों में भी मजदूर फ्री होने में देरी हो रही है। इस मामले में बड़ी समस्या यह है कि भले ही मंडियों में गेहूं की आमद तो बंद हो चुकी है, लेकिन एजैंसियों द्वारा खरीदी गई गेहूं लगाने हेतु गोदामों में जगह की कमी होने के कारण मंडियों में से गेहूं की लिङ्क्षफ्टग नहीं हो रही। इन मजदूरों ने लिङ्क्षफ्टग का पूरा काम मुकम्मल करने के बाद ही फारिग होना होता है, क्योंकि संबंधित ठेकेदार और आढ़ती पूरा काम संभाल कर ही इनका हिसाब-किताब करते हैं। ऐसी स्थिति में अब जब अभी भी सातवें चरण में पंजाब के साथ-साथ बिहार, पश्चिमी बंगाल और उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों में मतदान होना है तो भी यह मजदूर अपने संबंधित क्षेत्रों में जाकर वोट डालने से असमर्थ हैं।

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