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लालू प्रसाद यादव को इतिहास ने दिया बड़ा मौका, राजनीतिक चूक पड़ी भारी

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नई दिल्ली  । चारा घोटाले के एक मामले में लालू प्रसाद यादव की राजनीतिक किस्मत पर तकरीबन पटाक्षेप हो ही गया है, अब दूसरे मामले देवघर के कोषागार से 84.54 लाख रुपये की अवैध निकासी के मामले में भी उन्हें तीन जनवरी को सजा सुनाई जाने वाली है। यह पहला मामला नहीं है, जिसमें लालू को सजा होने जा रही है। इसके पहले तीन अक्टूबर 2013 को उन्हें चाईबासा कोषागार से 37.7 करोड़ रुपये की अवैध निकासी के मामले में सीबीआइ अदालत उन्हें पांच साल की जेल और 25 लाख रुपये की सजा सुना चुकी है। इसके बाद ही लालू यादव का चुनावी राजनीति का सपना धाराशायी हो गया। चुनावी कानूनों के तहत तीन साल या उससे अधिक की सजा प्राप्त व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकता। हालांकि जिस समय यह फैसला आया, लालू यादव संप्रग में शामिल थे और उसकी सरकार के मुखिया मनमोहन सिंह ने अध्यादेश के जरिए इस कानून में बदलाव की कोशिश की थी, लेकिन उस दौर के कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने दिल्ली स्थित प्रेस क्लब में अध्यादेश की कॉपी ही नहीं फाड़ी, लालू के राजनीतिक जीवन को भी रोक दिया था। फिर भी लालू की मजबूरी कि उन्हें उसी कांग्रेसनीत गठबंधन में रहना पड़ रहा है।

आखिर क्यों मजबूर हैं लालू
वैसे लालू की मजबूरी भी है। 1990 में उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी का रथ रोकने के साथ ही उन्हें गिरफ्तार करके जो राजनीति शुरू की है, उसमें उनके पास भारतीय राजनीति के दूसरे बड़े धड़े भाजपा की ओर जाने की राह बचती ही नहीं। आडवाणी की गिरफ्तारी के पहले तक वे सिर्फ पिछड़ों के ही हीरो थे, गिरफ्तारी के बाद वे मुस्लिम समाज के भी हीरो हो गए। यह विरोधाभास ही है कि बिहार में कांग्रेसी मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर के कुशासन के खिलाफ उभरे युवा और छात्र आंदोलन, जो बाद में जयप्रकाश आंदोलन के तौर पर जाना गया, के लालू यादव बड़ा चेहरा रहे हैं। पटना विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में 1973 में तब के समाजवादी धड़े की छात्र शाखा और एबीवीपी ने मिलकर चुनाव लड़ा था। उस चुनाव में समाजवादी खेमे ने अध्यक्ष के तौर पर लालू यादव और सचिव के तौर पर नरेंद्र सिंह को मैदान में उतारा तो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की ओर से महासचिव पद पर सुशील कुमार मोदी और दूसरे सचिव पद पर रविशंकर प्रसाद को उतारा। कहना न होगा कि कांग्रेस विरोधी मुहिम के अगुआ इस पैनल को जोरदार जीत मिली। आज उन दिनों के चारों साथी तीन अलग-अलग दलों में हैं।

जब लालू की खुली किस्मत

लालू यादव अब किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं, तो सुशील मोदी बिहार में उप मुख्यमंत्री हैं। वहीं रविशंकर प्रसाद केंद्रीय मंत्री हैं। नरेंद्र सिंह नीतीश कुमार के साथ हैं और बिहार में जदयू कोटे के मंत्री हैं। 1989 के आम चुनावों में बिहार की छपरा संसदीय सीट से सांसद चुने गए लालू यादव को केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह न मिलनी थी और न मिली। वजह यह थी कि बिहार की राजनीति में भदेस छवि के चलते उन्हें चाहे जितनी भी लोकप्रियता मिली हो, गंभीर राजनेता नहीं माना जाता था, लेकिन एक साल बाद ही हालात ने पलटा खाया। जिस देवीलाल ने अंदरखाने में वीपी सिंह से समझौता करके जनता दल का संसदीय दल का नेता चुने जाने के बावजूद अपनी पगड़ी वीपी सिंह के सिर रख दी थी, उसी राजा मांडा से उनकी अदावत शुरू हो गई थी। उस अदावत ने जैसे लालू यादव की किस्मत ही खोल दी। देवीलाल के तब के शिष्य शरद यादव, उनके चहेते मोहन प्रकाश और मोहन प्रकाश के चहेते नीतीश कुमार ने ऐसा जाल रचा, जिसमें उनके तब के शिष्य लालू यादव की किस्मत खुल गई। बिहार विधानसभा चुनावों में जनता दल को बहुमत तो मिला था, उसके साथ चुनाव लड़ी भाजपा के दक्षिण बिहार, जिसे अब अलग राज्य झारखंड के नाम से जाना जाता है, में 36 विधायक जीते थे, लेकिन वीपी सिंह ने साफ छवि के दलित नेता रामसुंदर दास को मैदान में उतार दिया। वीपी सिंह से उन दिनों चंद्रशेखर भी रुष्ट चल रहे थे।

लिहाजा माना जा रहा था कि अगर बिहार विधायक दल में मुकाबला हुआ तो वे लालू यादव को पटखनी देने में कामयाब होंगे। हालांकि कुछ विधायक चंद्रशेखर के भी चहेते थे। चंद्रशेखर को लगा कि अगर रामसुंदर दास के हाथ बिहार की कमान आई तो बिहार में विश्वनाथ प्रताप सिंह का वर्चस्व बढ़ जाएगा, लिहाजा उन्होंने अपने आदमी रघुनाथ झा को मैदान में उतार दिया। इस त्रिकोणीय मुकाबले में 13 विधायकों का ही समर्थन रघुनाथ झा को मिला, लेकिन बिहार की किस्मत पलट गई। लालू यादव बिहार के सितारे बन गए। तब से लेकर 2005 तक लगातार पंद्रह साल तक लालू के हाथ बिहार की कमान रही। 1997 तक वे खुद मुख्यमंत्री रहे, उसके बाद उनकी पत्नी राबड़ी देवी राज्य की कर्ता-धर्ता रहीं। शुरुआती दो-तीन सालों को छोड़ दें तो बिहार पर अपने शासन के आखिर तक लालू का ही एकाधिकार रहा।

जब लालू ने शरद यादव का छोड़ा साथ

लालू यादव बाद के दौर में उस शरद यादव का भी साथ छोड़ने से नहीं हिचके, जिनकी कोशिशों से उन्हें बिहार की सत्ता मिली। बिहार की सत्ता के उनके शुरुआती साथी नीतीश की छवि एक दौर में उनके छोटे भाई की तरह थी, लेकिन वे भी अलग हैं। आखिर ऐसा क्या हुआ कि लालू यादव से उनके नजदीकी लोग अलग होते गए। इसकी बड़ी वजह उनकी महत्वाकांक्षा और उनके सत्ता तंत्र पर परिवार का हावी होते जाना रहा। एक दौर में उनके साले साधु और सुभाष यादव बिहार की सत्ता के बड़े केंद्र रहे। इतने बड़े केंद्र की बिहार के कुशासन में हर बार उनका ही नाम लिया जाने लगा। यह बात और है कि जब तक लालू ने उन्हें बोझ के तौर पर समझना शुरू किया, तब तक देर हो चुकी थी।

लालू यादव को इतिहास ने बड़ा मौका दिया था। उनके पीछे भीड़ ऐसे उमड़ती थी, जिसकी वजह से उनकी रैलियों के लिए पुरुषवाचक शब्द रैला ही विकसित हो गया। लालू चाहते तो अपनी इस अपार लोकप्रियता के दम पर बिहार को बदल सकते थे। बेशक उन्होंने पिछड़ी जातियों में स्वाभिमान भरा, पर बदलाव का ठोस मानक वे पेश नहीं कर पाए। बिहार को वे चाहते तो उस युग के समानांतर खड़ा कर सकते थे, जिसे बिहार की धरती के ही शासन केंद्र रहे मौर्य युग और गुप्त काल के दौरान स्वर्ण युग कहा गया, लेकिन लालू ऐसा नहीं कर पाए।

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