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जब कोई पर्व होता है तो हमारे संस्थान सूने क्यों रहते हैं-?

जब कोई पर्व होता है तो हमारे संस्थान सूने क्यों रहते हैं?

ये हमारा दायित्व है कि हम उस संस्थान को भी उस पर्व और त्योहार के साथ साथ मनाए- योगी आदित्यनाथ

गोऱखपुर,

गोरखपुर। गोरखपुर मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ ने सरस्‍वती विद्या मंदिर चिउटहां में ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ सभागार का लोकार्पण किया. उन्‍होंने इस दौरान छात्र-छात्राओं को संबोधित करते हुए कहा कि तकनीक को खुद को हावी न होने दें. क्‍योंकि अक्‍सर ये देखने में आता है कि आजकल बच्‍चे स्‍मार्ट फोन का ज्‍यादा प्रयोग करते हैं. कैलकुलेटर का प्रयोग करते करते वे तकनीक के आदी हो जाते हैं. ऐसे में जब उनसे मामूली सवाल भी पूछे जाते हैं, तो वे जोड़ घटाना नहीं कर पाते हैं. तकनीक जब आगे चलने लगेगी, तो हम उससे पीछे हो जाएंगे. हमें इस बात का ख्‍याल रखना होगा.

आज शिवरात्रि का पावन पर्व है. इस संस्थान के उद्घाटन के बाद आज मुझे भी पहली बार मुझे यहां आने का अवसर मिला इसलिए बहुत प्रसन्नता हो रही है. जिज़ विद्यालय की नींव पड़ते, सब बनते देखा है, आज शिवरात्रि के पर्व पर मुझे यहां पर आने का अवसर मिला है. बिद्यालय परिवार को बधाई देता हूँ. सुदूर दक्षिण में भगवान राम ने रामेश्वरम में लंका जाने के लिए जब पुल का निर्माण किया था वो भगवान शिव की आराधना के साथ किया था. शिवरात्रि हिन्दू धर्म का विशेष पर्व है. इसका बहुत महत्व है. कैलाश मानसरोवर की चोटी का दर्शन हम भगवान शिव के रूप में ही करते हैं.

शिवरात्रि के दिन किसी संस्था का कार्यक्रम एक संदेश देता है. ज्ञानी वही बन सकता है जिसके मन में श्रद्धा और विरासत और संस्कृति और सभ्यता हो. भारत के अंदर ये बात कूट-कूट कर भरा है. प्रत्येक भरवासी को इस पर गर्व करना चाहिए. कण-कण में भारत के शिव का वास माना गया है. शिवरात्रि पर्व मनाया जाता है. शिवरात्रि के दिन किसी विद्यालय में कार्यक्रम इस बात को बताता है कि बच्चों के सर्वांगीण विकास के।लिए वो कितने तत्पर है. लेकिन कोई संस्थान के लिये भी कुछ करते हैं.

जब कोई पर्व होता है तो हमारे संस्थान सूने क्यों रहते हैं?ये हमारा दायित्व है कि हम उस संस्थान को भी उस पर्व और त्योहार के साथ जोड़ें. कोई पर्व होता है दिवाली और होली के साथ अन्य तो हम घर की साफ सफाई के साथ उसे सजाते हैं. हमारी सरकार ने निर्णय लिया कि किसी महापुरुष की जयंती पर हम छुट्टी नहीं करेंगे. उन्हें संस्कारवान भी बनाए. शिक्षा और संस्कार का केंद्र बनकर ये शहर के बाहर भी शिक्षा का प्रसार कर रहा है. इस बात की प्रसन्नता है. पाँच दशक से बिद्या मंदिर परिवार तमाम चुनौतियों का सामना करते हुए आगे बढ़ रहा है. मां सरस्वती के लिए हर कोई सरस्वती जी की आराधना करते हैं. लेकिन आजकल की आपाधापी में शैक्षणिक संस्थाएं स्कूली पाठ्यक्रम तक हरे खुद को सीमित न रखें.

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