LUCKNOW

कोविड-19 महामारी और प्रवासी श्रमिक

मनोज कुमार की कलम से
सहायक प्रबन्धक
राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक
झारखंड क्षेत्रीय कार्यालय, राँची

नॉवेल कोरोना वायरस जनित बीमारी कोविड-10 समस्त मानवजाति के लिए एक चुनौती बन के आया है। आज पूरा विश्व इस महामारी से संघर्ष कर रहा है। भारत भी इस बीमारी से अछूता नहीं है। जानकारी मिलने तक करीब 44000 लोग इस बीमारी से ग्रसित हो चुके थे। इस बीमारी से बचने के लिए सभी लोग अपने घरों में कैद हैं। केवल आवश्यक सेवाओं और आपूर्ति की दुकाने ही खुली हुई है। बंदी का असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ा है, लेकिन सबसे ज्यादा प्रभावित प्रवासी मजदूर वर्ग हुआ है। प्रवासी मजदूर, जिसके पास रहने के लिए अपना मकान भी नहीं होता है, जो दैनिक मजदूरी से अपनी जरूरतों को पूरा करता है, लॉकडाउन के कारण अपना पेट भी नहीं भर पा रहा है।
एक आकलन के अनुसार, भारत में लगभग 12 करोड़ लोग गाँव से शहरों में रोजगार के लिए प्रवास करते हैं। अधिकतर प्रवासी मजदूर असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। इनमें सबसे ज्यादा 4 करोड़ निर्माण क्षेत्र, 2 करोड़ घरेलू कार्य, 1.2 करोड़ कपड़ा मिल,1 करोड़ ईंट भट्टियों में काम करते हैं। इन मजदूरों को किसी तरह की सामाजिक सुरक्षा का लाभ नहीं मिलता है। कोरोनावायरस से बचाव के लिए भारत सरकार द्वारा 25 मार्च से 21 दिन के लॉकडाउन की घोषणा की गई। सभी निर्माण कार्य, फैक्ट्रीयां बंद हो गई, घरों में काम करने वाले घरेलू कामगारों का काम पे जाना बंद हो गया, समाचार पत्र बाटने वाले का काम बंद हो गया। दैनिक मजदूरी कर रोजी-रोटी चलाने वाले प्रवासी मजदूर के लिए 21 दिन का लॉकडाउन कहर बन कर आया। महानगरों से सड़कों पर पैदल, हजारों किमी दूर अपने घरों को जाते इन मजदूरों का दर्द और कोई नहीं समझ सकता।
यह दृश्य हमें इन प्रवासी मजदूरों की स्थिति पर सोचने को मजबूर करता है। भारत मे असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले मजदूरों के लिए बहुत ही कम सुविधाएं हैं। इन मजदूरों को किसी श्रम कानून का कोई लाभ नहीं मिलता है। बीमा, भविष्य निधि, मातृत्व लाभ, अर्जित अवकाश, बोनस, आवास इत्यादि कोई भी सुविधा का लाभ इस वर्ग को नहीं प्राप्त है। औद्योगिक इकाइयों में काम करने वाले ठेका मजदूरों को भी काफी काम वेतन पर काम करना पड़ता है, अधिकांश लाभ ठेकेदार ले जाते हैं। भवन और अन्य निर्माण श्रमिक कल्याण उपकर कोष में ₹52,000 करोड़ जमा हैं, लेकिन श्रमिकों के कल्याण हेतु बहुत ही कम खर्च होता है। भारत सरकार द्वारा इन मजदूरों के लिए असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा अधिनियम, 2008 लाया गया लेकिन इस योजना का प्रभाव भी सीमित है। प्रवासी मजदूर के निबंधन हेतु अंतरराज्यीय प्रवासी कामगार अधिनियम, 1979 है, लेकिन किसी भी राज्य सरकार के पास प्रवासी मजदूर का कोई डेटाबेस नहीं है।

अब समय आ गया है जब सरकार को भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ इन वर्ग के कल्याण के लिए ठोस कदम उठाना चाहिए। सरकार को सावभौमिक सामाजिक सुरक्षा की दिशा में कदम उठाना चाहिए। सरकार को एक श्रमिक कल्याण फ़ंड बनाकर, सभी असंगठित क्षेत्र के कामगारों को बीमा, भविष्य निधि, आवास का प्रावधान करना चाहिए। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत “एक राष्ट्र एक राशन कार्ड” योजना को पूरे देश में लागू करना चाहिए, जिससे प्रवासी मजदूरों को उनके कार्यस्थल के नजदीक राशन मिल जाए। सरकार द्वारा दी जा रही सभी सुविधाओं को आधार नंबर का उपयोग कर पोर्टबल (portable) बनाया जाना चाहिए। सभी प्रवासी मजदूरों का डेटाबेस बना कर उनके कल्याण हेतु योजना चलानी चाहिए। अर्थव्यवस्था के पुन: संचालित करने में प्रवासी मजदूरों की भूमिका अहम होगी। अत: हमें इस वर्ग की समस्याओं पर ध्यान देना होगा तथा तुरंत समाधान खोजना होगा।

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