राजनीति

वैश्विक सत्ता संस्थान और जनभागीदारी’- कुसुमलता मलिक

– कुसुमलता मलिक
(प्रोफ़ेसर, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय)

शायद ही हम में से किसी को याद हो कि वोहरा समिति 1993ई. की रिपोर्ट में पहली बार भारतीय राजनीतिक इतिहास में अर्थशास्त्र को लेकर भ्रष्टाचार के चौंकाने वाले आँकड़े प्रस्तुत किये गये थे।तब से लेकर आजतक उस रिपोर्ट पर कभी भी किसी भी सरकार ने ग़ौर नहीं फ़रमाया।माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की दूसरी पारी को लेकर जनता के भीतर कहीं कुछ आशा जगी है कि शायद हर स्तर पर अपने अनुसार रिकॉर्ड तोड़ने वाले हमारे लोकप्रिय प्रधानमंत्री सम्भवत: वोहरा समिति की रिपोर्ट को आवश्यकता अनुसार क्रियान्वित करके पिछली गठित सरकारों का यह रिकॉर्ड भी तोड़ देंगे!जनता की भी ऐसी ही सदिच्छा है जो उसने रिकॉर्ड तोड़ मतदान करके व्यक्त की थी।प्रश्नमात्र सपनों, इच्छाओं, आशाओं का ही नहीं है, प्रश्न तो इनसे भी कहीं बहुत-बहुत बड़ा और अतिशय व्यापक है।हम अपने इस छोटे से लेख में इसी संदर्भ में बात करेंगे।

बात भारत की स्वतंत्रता की हो या संविधान की मान्यता की, चुनाव प्रणाली की हो या संवैधानिक संस्थानों की।बात घूम फिर कर सत्ता और जनता के दिन-प्रतिदिन बिगड़ते, रगड़ खाते, बनते और निरंतर बदलते संबंधों पर ही आकर टिक जाती है।संबंधों की यह गाथा इतनी गूढ़ प्रतीत होती है कि निर्णायक निर्णय करने की बजाय स्वयं को ही इसकी गुंजलिका में लिखता हुआ अनुभव करने लगता है।यदि निर्णायक जनता के पक्ष में निर्णय दे, तो वह सत्ता की नज़र में खूँखार हो उठता है और यदि निर्णायक सत्ता के पक्ष में निर्णय सुना दे तो वह जनद्वेषी ठहराया जाता है और यदि वह निष्क्रिय, मात्र चिंतन-मनन में लगा रहे तो उसे गुंजलिका में कसकर धीरे-धीरे अपने प्रश्नों को ही मार डालता है।प्रश्न यह है कि आख़िरकार जनता और सत्ता दो विरोधी ध्रुवों की तरह पिछले 72 वर्षों में क्यों उभरे हैं? इन्हें तो एक-दूसरे का परिपूरक बनकर उभरना चाहिए था।जनता और सत्ता को तो एक-दूसरे का शक्तिदाता बनना चाहिए था।दोनों की ही शक्तियाँ अन्योन्याश्रित होनी चाहिए थीं, पर हुआ इसका एकदम उलट।

कोरोना वैश्विक महामारी मात्र नहीं है।यह तो समूची मानवता पर आकस्मिक रूप में आगत विकट संकट है।इस संकट ने विश्वभर की सरकारों के विश्वभर की जनता के साथ संबंधों को उद्घघाटित कर उन्मुक्त भाव से विश्व पटल पर रख दिया है।जिन सरकारों ने अपनी प्राथमिकता जनसेवा में दिखाई वे भी सबके समक्ष हैं और जिन सरकारों ने जनता की अवहेलना की वे भी किसी से छुपी नहीं हैं।हमारी सरकार ने देर से ही सही तालाबंदी कर, जनसुरक्षा को वरीयता तो दी है और स्वागत योग्य माननीय प्रधानमंत्री जी का वह कदम भी है जिसमें उन्होंने सांसदों और मंत्रियों को दिये जाने वाले भत्तों में एक वर्ष तक 30 प्रतिशत कटौती की घोषणा की है।जनता यह जानती है कि संसद में वर्तमान समय में करोड़पति सांसदों की संख्या काफ़ी है।यदि उन्हें 2024 तक भी वेतन न दिया जाये तब भी उनके निधिपतित्व को कोई खतरा पैदा होने वाला नहीं है।जहां एक ओर जनता में ग़रीबी, बदहाली, भुखमरी और बेकारी बढ़ी है तो वहीं दूसरी ओर पिछले 72 वर्षों से जनता यह देखती आई है कि आपातकाल हो अथवा विपत्तिकाल, उनके नेताओं के न सिर्फ़ बैंक बैलेंस सैंकडों गुना बढ़े हैं, बल्कि चल अचल संपत्ति के आधार और कारोबार भी कई हज़ार गुना बढ़े हैं।

आज जनता पीड़ितों की सहायता के लिए दान, सेवा और सहयोग कर रही है पर नेताओं की ओर से यह सकारात्मक पहल दृष्टिगत नहीं हो रही।जहां एक ओर उद्योगपतियों, व्यापारियों, कलाकारों, अभिनेताओं इत्यादि ने आगे बढ़कर जनसेवा हेतु करोड़ों रुपये दिये हैं वहाँ हमें इस पंक्ति में कोई विधायक, कोई सांसद, कोई मंत्री, कोई नेता दृष्टिगत नहीं होता।

पुन: वोहरा समिति की रिपोर्ट पर लौटते हैं आज हमारे 4 हजार 83 विधायकों में से लगभग 30 प्रतिशत विधायकों पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं, उन पर किस्म-किस्म के मुकद्दमे चल रहे हैं।सांसदों का भी यही हाल है ऐसे में जनता और सत्ता के समीकरण संतुलित कैसे हों? जिस देश के 60 प्रतिशत किसानों की फसल अपने समुचित भुगतान हेतु व्यवस्था की मांग कर रही हो, जिस देश के 20 से 25 प्रतिशत दिहाड़ी मज़दूर भुखमरी और बदहाली का शिकार हो रहे हों, जिस देश की आधी आबादी आज़ादी के 72 वर्षों परांत भी अपने नेताओं से शिष्ट भाषा, सम्मान और न्यूनतम 33 प्रतिशत आरक्षण प्राप्त न कर पा रही हो उस देश में सत्ता और जनता के संबंधों को फिर से व्याख्यायित करना होगा इसमें संदेह नहीं किया जा सकता कि, “अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे।
तोड़ने ही होंगे मठ और गढ़ सब।”

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