Sultanpur

प्रेम मगर मुख वचन न आवा….अरे! बहिनी हमतव आपन बतिइयो न कहि पाइन, अविश्वसनीय और अकल्पनीय दृश्य बयां कर “बिलखने” लगी गीता

त्रेता युग में था इंतजार, कलयुग में हुआ अचानक आश्चर्यजनक

सिर पर हाथ रखकर अफसोस में डूबी महिला

 

सुल्तानपुर(विनोद पाठक)। पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं सुल्तानपुर सांसद मेनका गांधी के दौरे में जो अद्भुत दृश्य देखने को मिला, किसी साधारण महिला के लिए यह अविश्वसनीय और अकल्पनीय है। यह दृश्य त्रेता युग की याद दिलाता है, जिसमें इंतजार था। लेकिन कलयुग में यह अचानक आश्चर्यजनक। अपने बीच “गांधी” खानदान के ‘बहू’ को देखा, लेकिन निषाद समुदाय की महिला समझ न सकी। मरमु इसका महिला को तब समझ में आया, जब उनके बीच से देश के बड़े राजनैतिक “खानदान” की ‘महिला’ चली गई तो महिला के हाथ में केवल “पछतावा” ही रह गया। अरे बहिनी! हम तो आपन बतिया भी नय कह सकिन। कुछ बतियाउका नाही पाइन। कह के महिला भावुक होकर “बिलखने” लगती है। पूरा का पूरा गांव सांसद मेनका गांधी के इस कार्यशैली का गुणगान कर रहा है। अर्थात देखत “बनत बतावत नाय”।
गौरतलब हो कि सुल्तानपुर सांसद मेनका संजय गांधी तीन दिवसीय दौरे पर आई हुई थी। दौरे के दूसरे दिन जयसिंहपुर विधानसभा क्षेत्र के बहाउद्दीनपुर गांव में जनसभा लगी थी। जनसभा से वापस आते वक्त इसी गांव की महिला गीता निषाद मूंज का बाध बनाने के लिए मुंगरी लेकर पीट रही थी। उसे क्या पता की त्रेता युग की तरह एक दिन उनकी “कुटिया” में देश के सबसे बड़े राज राजनैतिक राजघराना की “बहू” सांसद मेनका गांधी आएंगी। त्रेता युग में सेवरी प्रभु श्री राम के आने का बहुत लंबे समय तक इंतजार किया था। लेकिन जब सेवरी के आश्रम में प्रभु श्री राम के आने का समाचार मिलता है तो सेबरी भी धन्य हो जाती है। ऋषि “मतंग” के दिए आशीर्वाद को स्मरण करके सेवरी गदगद हो जाती हैं। वह दौड़ कर अपने प्रभु श्रीराम के चरणों में लिपट जाती है। इस भावनात्मक दृश्य का गोस्वामी तुलसीदास ने कुछ इस तरह रेखांकित किया है कि ” सरसिज लोचन बाहु बिसाला, जटा मुकुट सिर उर बनमाला, प्रेम मगर मुख वचन न आवा, पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा, सादर जल लै चरण पखारे, पुनि सुंदर आसन बैठारे,
यहां पर सेवरी को आवा भगत करने का मौका मिला। प्रभु के चरणों से निपटने का भी समय मिला। अपनी बात भी कही। लेकिन निषाद महिला और गांधी खानदान की सांसद बहू के आवा भगत भी निषाद महिला गीता न कर सकी। सांसद मेनका गांधी के मरमु को भी निषाद महिला नहीं समझ सकी। इस पर त्रेता युग की एक मार्मिक घटना भगवान प्रभु श्रीराम के वन जाते समय याद दिलाती है कि जब प्रभु श्री राम श्रृंगवेरपुर से जाने लगे और गंगा नदी को पार करना था, जब प्रभु श्रीराम केवट से कुछ यूं तरह अर्चना करते हैं कि मांगी नाव न केवट आना, कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना, को याद दिलाता है। त्रेता युग में केवट ने प्रभु श्रीराम के मरमु को समझ और जान लिया था, लेकिन कलयुग में माता सीता रूपी मिली सांसद के मरमु को निषाद समाज की महिला समझ पाई, न ही जान सकी। जब मूंज को पीट रही महिला पर दृष्ट सांसद मेनका गांधी की पहुंचती है और महिला के बीच में साधारण महिला की तरह बैठकर मूँज को मूसर से पीटने का काम करने लगती हैं, तब भी निषाद समुदाय की महिला नहीं समझ पाती है कि उनके बीच मूँज पीट कर हाथ बटा रही महिला कौन है? केवल उसे इतना पता था कि जो लोग उनके साथ चल रहे हैं,सब के सब माता के नाम से पुकार रहे हैं तो महिला भी माता के नाम से ही अनुनय विनय कर रही है कि माताजी रहय दिएं, हम आपसे हाथ जोड़त अहि। लेकिन माता जी भी उस महिला की बात नही मानती हैं। हाथ मे मूसर लइके मूँज का पीटब शुरू कर देती हैं। शायद सांसद जी मूँज को इसलिए पिटती हैं कि महिला के द्वारा किए जा रहे मेहनत के दर्द का मरमु समझ सके और आगे चलकर निषाद समुदाय को आगे बढ़ाने के लिए मरहम भी लगा सके। अर्थात मूंज उद्योग को बढ़ावा देने के लिए निश्चित तौर पर सांसद मेनका गांधी अब कुछ न कुछ कर गुजरेगी। इसलिए सांसद ने इन हालातों को समझा और मूंज को पीटा और उसमें आ रही दिक्कतों को भी साझा करने का प्रयास किया। जब सांसद मेनका गांधी अपने कार्य करने की इस कार्यशैली की छाप छोड़ कर निषाद महिला के बीच से चली गई तो गांव वालों ने गीता निषाद से पूछा कि कुछ समझू कि नाही। तोहरे सथवा जवन मुंजिया पिटते रहिन, जानू कि नाही,के रहा। जरा बतावा तव। अरे दीदी! हमतव नाही जानन, के रहा तनी तुहिन बतावा तव। जैइसन महिला जानिस की हमारे साथे जवन मूँज पिटते रहिन माता मेनका गांधी रहिन। मुड़े पर हाथ रख के अफसोस मा डूब गय। अरे बहिनी! हम तव आपन बतिइयो न कहि पाइन। इतने बड़े घरे कय बहू जमीनी मा बइठ के हमरे साथे मूँज पिटी, हम तव समझिन न पाइन। आपन बतिइयो न कहि पाइन। कह के बिलखने लगती है। यह वाकया गांव में चर्चा का विषय बना हुआ है। इस वाकए से अन्य जनप्रतिनिधियों को भी सबक लेना चाहिए। जनता के बीच में जनप्रतिनिधियों को जाना चाहिए। साथ ही जनता की पीड़ा को भी समझना और साझा करना चाहिए। उन लोगों के मुंह को सांसद मेनका गांधी ने बंद करने का काम किया है जो कहते थे कि मेनका गांधी बड़े घर की बहू हैं? उन्हें क्या पता की जनता की समस्या क्या होती है? सांसद मेनका गांधी ने अपने तीन साल के कार्यकाल के दौरान यह सिद्ध कर दिया है कि उन्हें हर सुख दुख का अनुभव है और उसे दूर करने का प्रयास भी करती ही नहीं है बल्कि उस पर “अमलीजामा” पहनाने का भरसक प्रयास भी रहता है। यही कारण है कि सुल्तानपुर जनपद में बहुत सारी समस्याएं मुंह बाए खड़ी थी, उन समस्याओं को खत्म करने का बीड़ा सांसद मेनका गांधी ने उठाया है। ढेर सारी समस्याओं को सांसद ने खत्म कर दिया है और जो बच्ची समस्याएं हैं, उस पर दिन और रात सांसद मेनका गांधी प्रयासरत भी हैं।

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