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क्वॉरेंटाइन को प्राचीन समय में अल _अरबिया (द फोर्टी) के नाम से जाना जाता था मिन्नत गोरखपुरी

क्वॉरेंटाइन को प्राचीन समय में अल _अरबिया (द फोर्टी) के नाम से जाना जाता था मिन्नत गोरखपुरी

गोरखपुर शहर के युवा शायर एवं संचालक समाजसेवी स्वर्गीय मनोहर पर्रिकर साहित्य सम्मान एवं पूर्वांचल यूथ आईकॉन अवार्ड से सम्मानित मिन्नत गोरखपुरी ने बताया कि देश में फैली कुरौना वायरस जैसी वैश्विक महामारी से बचने के लिए जिस क्वॉरेंटाइन पद्धति का इस्तेमाल किया जा रहा है इस पद्धति की उत्पत्ति बू अली सीना (इब्ने सीना ) द्वारा कई 100 वर्षों पहले की जा चुकी है। मिन्नत गोरखपुरी ने बताया कि विकिपीडिया से प्राप्त जानकारी के अनुसार इब्ने सीना का जन्म 980 में बोखारा उज्बेकिस्तान के एक गांव में हुआ था। उस समय बोखारा ईरान का हिस्सा हुआ करता था वह फारस का विद्वान होने के साथ-साथ आपने और इस्लामिक स्वर युग के सबसे महत्वपूर्ण चिकित्सक, लेखक, खगोलशास्त्री,तर्कशास्त्री व दर्शनशास्त्री थे।
इब्ने सीना ने मोएजजात और आदतके तहत इस्लामी शरीयत का बहुत बड़ा हिस्सा हल किया ये सब ज्ञान उन्हेंने अरस्तु और फारसी से हासिल किया इसलिए मुस्लिम हकीम उन्हें (मोअल्लिम सानी) भी कहते हैं। और यूरोप में उन्हें ऐविसेना रूप में जाना जाता है। उन्होंने विविध विषयों पर लगभग साढे 400 पुस्तके लिखी जिनमें से 250 अभी मौजूद हैं और इन पुस्तकों में 15 पुस्तकों का संबंध चिकित्सा विज्ञान से है।
अपने वक्त में उनको संदेह था कि कुछ रोग सुक्ष्मजीवो द्वारा फैलते हैं। इसलिए उन्होंने मानव से मानव संदूषण को रोकने के लिए 40 दिनों के लिए मानव से मानव को अलग रखने की विधि का सर्वप्रथम उपयोग किया। और इस पद्धति को अल_अरबिया का नाम दिया। वेनिस (इटली) के भाइयों ने जब उनकी सफल विधि के बारे में सुना तो वह इस ज्ञान को समकालीन इटली में वापस ले गए और इससे क्वॉरेंटाइन इतालवी मे चालीसवां कहां है। जो आज मौजूदा समय में संपूर्ण विश्व जब करुणा वायरस से अपने अपने देश को सुरक्षित रखने वह बचाने के लिए नए, नए शोध कर रहा है। तू इस समय में उस प्राचीन विधि को क्वॉरेंटाइन/संगरोध का इस्तेमाल किया जा रहा है। जिस पद्धति को लोग नवीनतम समझ रहे हैं। दरअसल इसकी उत्पत्ति कई 100 वर्षों पूर्व इब्ने सीना द्वारा की जा चुकी है।

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