संम्पादकिय

है कैद आज घरो में तो क्या, कल फिर होगा परिंदों की तरह उड़ना;


है आज मुंह को बांधे तो क्या, कल फिर होगा खुले हवाओं में सांस लेना;
है मन रही बिन हाथ मिलाए आज खुशियां तो क्या ,कल फिर होगा अपनों से गले लगना;
होगी रूखशती इस कोरोना की भी, बस सोशल डिस्टेन्शिग यूं ही अब भी बनाए रखना;;

आती है रात अगर बिन चांद के भी ,तो तय है अगले दिन सूरज का निकलना;
गिरते हैं अगर पत्ते शाखो से भी, तो तय है उन पेड़ों पर नए पत्तो का भी आना;
कहां मुमकिन है ये कि ज़मीं प्यासी हो पानी को और सावन का ना हो आना;
होगी रूखशती इस कोरोना की भी ,बस लाकडाउन का पालन अब भी यूं ही करते रहना;;

हां खोया है हमने लाखों अपनों को, इस कोरोना की महामारी में;
पर कितने साल बाद तो देखो, कुदरत ने भी चैन की सांस पायी है;
रब ने हमें बनाया है …हमने रब को ना बनाया है;
इस बात को भी तो देखो कोरोना ने ही याद दिलाया है;
होगी रूखशती इस कोरोना की भी ,बस कुदरत से इंसानों तक हुए इस बदलाव को अब यूं ही बनाए रखना!!!!

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